चक्रधर समारोह

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शताब्दी दर शताब्दी बीतती जाती है तब जाकर किसी एक शताब्दी की कोख से पैदा होता है कोई कालजयी सांगीतिक व्यक्तित्व! संगीतमर्मज्ञ महाराजा चक्रधर सिंह ऐसे ही विशिष्ट सांगीतिक व्यक्त्वि के धनी और कलापारखी नरेश थे। यह चक्रधर समारोह इन्ही कलामर्मज्ञ महाराजा चक्रधर सिंह को पूरे देश की साँझी कलाकार बिरादरी का सांगीतिक और साहित्यिक नमन है।

महाराजा चक्रधर सिंह के राजघराने की पीढ़ी में राजा भूपदेव सिंह के द्वितीय पुत्र गोंडवंश के आदिवासी राजा चक्रधर सिंह का जन्म भाद्र पद संवत् 1962 को हुआ। आपके जन्म दिवस को राजकीय समारोह के रूप में मनाने के लिए ‘‘ऐतिहासिक गणेश मेला’’ का शुभारम्भ किया गया जो रायगढ़ के सांस्कृतिक गौरव के रूप में पूरे राष्ट्र में प्रसिद्ध हुआ जिसमें देष के शीर्षस्थ प्रतिष्ठित कला, संगीत एवं साहित्य साधकों और क्रीड़ा जगत की प्रख्यात प्रतिभाओं को आमंत्रित कर सम्मानित किया जाता था। गणेश मेला के माध्यम से राष्ट्र की कला व संस्कृति को पर्याप्त संरक्षण प्राप्त हुआ है जिससे रायगढ़ ने छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक राजधानी व कला की तीर्थस्थली के रूप में पूरे राष्ट्र में प्रसिद्धि प्राप्त की।

रायगढ़ दरबार, संगीत के उद्धारक पं. विष्णु दिगम्बर पलुस्कर, पं. ओंकार नाथ ठाकुर, पं. भूषण संगीताचार्य, बड़े रामदास, उस्ताद इनायत खाँ, कादर बख्श, मुनीर खाँ, कंठे महाराज, पं. बिंदादीन, सीताराम जी, हनुमान प्रसाद, सुखदेव महाराज, सुन्दर प्रसाद, जयलाल, लच्छू एवं अच्छन महाराज जैसे प्रख्यात साधकों की तपोभूमि रही है।

महाराजा चक्रधर सिंह ने देश के शीर्षस्थ नृत्याचार्यों से पं. कार्तिकराम, कल्याणदास महंत, बर्मनलाल एवं फिरतु महाराज को कथक की शिक्षा दिलाई जिन्होंने राष्ट्रीय ख्याति अर्जित की एवं मध्यप्रदेश शासन ने पं. कार्तिक राम, कल्याणदास, फिरतु महाराज एवं बर्मनलाल जी को शिखर सम्मान से सम्मानित किया। संगीत सम्राट राजा चक्रधर सिंह ने कथक की एक अभिनव शास्त्रीय शैली का विकास किया जो ‘‘रायगढ़ कथक घराना’’ के नाम से विख्यात है।

राजा चक्रधर सिंह ने संगीत एवं साहित्य के कई अमूल्य ग्रंथों की रचना की है जिसमें नर्तन सर्वस्वम्, तालतोय निधि, राग रत्न मंजूषा और मुरज परण पुष्पाकर प्रसिद्ध हैं। इसी तरह कई प्रसिद्ध साहित्य कृतियां भी हैं। साहित्य संगीत की एक समृद्ध परम्परा है। साहित्य मर्मज्ञो में पं. सदाशिव दास, पं. भगवान पाण्डेय, जानकी वल्लभ शास्त्री, भगवती चरण वर्मा तथा रामकुमार वर्मा प्रमुख हैं। संगीत जगत की वर्तमान पीढ़ी में इस परम्परा का निर्वहन कर रहे हैं संगीत शिरोमणि श्री वेदमणि सिंह ठाकुर, पं. रामलाल, निमाई चरण पण्डा, जगदीश मेहर, मनहरण सिंह ठाकुर एवं सुनील वैष्णव। राजा चक्रधर सिंह के देहांत के बाद उनके पुत्र राजा ललित सिंह, सुरेन्द्र कुमार सिंह और कुमार भानुप्रताप सिंह द्वारा कई वर्षों तक इस परम्परा का निर्वाह किया गया।

1984 में सर्वोदयी नेता केयूर भूषण की अध्यक्षता में राजपरिवार के सदस्यों, साहित्यकारों और संगीतकारों की एक सभा हुई। पं.मुकुटधर पाण्डेय, पं. किशोरी मोहन त्रिपाठी, लाला फूलचंद्र श्रीवास्तव, जगदीश मेहर, डाॅ. बलदेव, मनहरण सिंह ठाकुर, वेदमणि सिंह ठाकुर, रजनीकांत मेहता, राजपरिवार के पूर्व सांसद सुरेन्द्र कुमार सिंह, कुमार भानुप्रताप सिंह, उर्वशी देवी एवं देवेन्द्र प्रताप सिंह (सदस्य) इसके संरक्षक हुए। बाद में इसमें यहां के पत्रकार, साहित्यकार, संगीतकारों एवं प्रबुद्ध नागरिकों की हिस्सेदारी बढ़ती गई।

सर्वप्रथम गणेशोत्सव छत्तीसगढ़ के प्रसिद्ध संत कवि पवन दीवान द्वारा राजमहल परिसर में 18-09-1985 को उद्घाटित हुआ जिसे दो चार वर्षों में ही राष्ट्रव्यापी ख्याति मिली। पं. मुकुटधर पाण्डेय ने इसे रायगढ़ के सांस्कृतिक जीवन में महत्वपूर्ण मानते हुए सार्वजनिक रूप से मनाया जाने वाला गणेशोत्सव निरूपित किया। महल का गणेशोत्सव राजकीय था। यह एक प्रकार से नये युग की शुरूआत थी।

छत्तीसगढ़ शासन द्वारा चक्रधर समारोह सन् 2001 से शुरू किया गया जो अब तक उत्तरोत्तर आगे बढ़ रहा है। छत्तीसगढ़ शासन ने इस परम्परा को समृद्ध करते हुए दस दिवसीय समारोह को शासकीय मान्यता प्रदान कर सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण एवं उन्नयन में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया और रायगढ़ को पुनः कला व संगीत की तीर्थस्थली के रूप में गौरवान्वित किया है। संस्कृति विभाग- छत्तीसगढ़ शासन, जिला प्रशासन एवं जन सहयोग से रायगढ़ का ऐतिहासिक राष्ट्रीय सांस्कृतिक उत्सव गणेश मेला, ‘‘चक्रधर समारोह’’ का यह 34वाॅ गौरवपूर्ण-आयोजन है।